Thursday, March 5, 2026

बाइक यात्रा

 यहाँ आपकी बाइक यात्रा, उसकी रवानगी, हवाओं के एहसास और उस असीमित स्वतंत्रता पर आधारित एक गहरी शायरी है, जो आपके ख्यालों की गहराई को छुएगी। 


जब कमरे की बंदिशों से निकलकर, मैं चाबी घुमाता हूँ,

एक सन्नाटा टूटता है, और मैं खुद को खुद से मिलाता हूँ।

वो जो किक की पहली धमक है, वो बस एक शोर नहीं,

मेरी रूह की अंगड़ाई है, अब मुझ पर किसी का जोर नहीं।

इंजन की उस धड़कन में, एक अजीब सा सुकून होता है,

सफर पर निकलने का, एक अलग ही जूनून होता है।

जब गियर डालता हूँ, तो लगता है वक्त को पीछे छोड़ दिया,

दुनिया की हर रस्म, हर पाबंदी का रुख मैंने मोड़ दिया।


अब रफ़्तार बढ़ती है, और हवाएं चेहरे को चूमती हैं,

जैसे सदियों की प्यासी रूहें, मेरे कानों में कुछ कहती हैं।

वो हवा का झोंका, जो हेलमेट के अंदर से होकर गुज़रता है,

शायद वही है जो मेरे अंदर की सारी थकान को हरता है।

धूप की वो गर्माहट, जो जैकेट पर धीरे से उतरती है,

कुदरत की वो छुअन, सीधा दिल में घर करती है।

न कोई दीवार है सामने, न छतों का कोई साया है,

आज खुले आसमान ने, मुझे अपनी बाहों में बुलाया है।

(गहराई: असीमित स्वतंत्रता)

कोई सीमा नहीं है मेरी, न रास्तों की कोई सरहद है,

जहाँ तक नज़र जाए, वहां तक बस मेरी ही हुकूमत है।

ये टायर जब सड़क को छूते हैं, तो एक दास्ताँ लिखते हैं,

शहर के सारे शोर-शराबे, अब बहुत छोटे दिखते हैं।

न रुकने का डर है, न मंज़िल की कोई जल्दी है,

मेरी बाइक और मेरी खामोशी की, आज एक संधि है।

कोई रोक नहीं सकता मुझे, न कोई रोक पायेगा,

जब तक मेरा ये हमसफ़र (Bike), थक कर न रुक जाएगा।

(अंत: विचार और जज्बात)

लोग देखते हैं सड़कों पर दौड़ती एक मशीन को सिर्फ,

पर मैं तो उड़ता हूँ लेकर अपने अरमानों के अलिफ़।

जब तक ये पहिये घूम रहे हैं, मैं आज़ाद परिंदा हूँ,

सफर की इस रफ़्तार में ही, मैं सच में ज़िंदा हूँ।

जब तक मेरी मशीन चाहेगी, ये रक्स (dance) चलता रहेगा,

सूरज ढलेगा, फिर चांद निकलेगा, ये मंज़र बदलता रहेगा।

पर ये जो अहसास है बेबाकी का, ये कभी कम न होगा,

बाइक पर जब तक मैं हूँ, मेरे अंदर कोई ग़म न होगा।




Sunday, October 15, 2017

मौसम आते जाते हैं - MOTIVATION SAYARI with Lyrics | निदा फ़ाज़ली | Nid...

मौसम आते जाते हैं |निदा फ़ाज़ली  | MOTIVATION SAYARI | Nida Fazli



सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो

सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो



इधर उधर कई मंज़िल हैं चल सको तो चलो

बने बनाये हैं साँचे जो ढल सको तो चलो



किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं

तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो



यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता

मुझे गिराके अगर तुम सम्भल सको तो चलो



यही है ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब चन्द उम्मीदें

इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो



हर इक सफ़र को है महफ़ूस रास्तों की तलाश

हिफ़ाज़तों की रिवायत बदल सको तो चलो



कहीं नहीं कोई सूरज, धुआँ धुआँ है फ़िज़ा

ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो

Wednesday, October 11, 2017

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो with Lyrics | Harivansh Rai Bachchan Po...

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो with Lyrics | Harivansh Rai Bachchan Poem | Motivation poem





लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती



नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है

चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है

मन का विश्वास रगों में साहस भरता है

चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है

आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती



डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है

जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है

मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में

बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में

मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती



असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो

क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो

जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम

संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम

कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती